Tuesday, 23 June 2015

मालवीय जी के प्रयासों की छोटी सी छवि –


मित्रों, आज का मानव जीवन अत्यंत व्यस्त होता प्रतीत हो रहा, अधिकांश लोगों को इस बात का अनुमान भी नही होता कि आज जिन चीजों का वो लाभ उठा रहे है, जो स्वतन्त्र देश आज उनके सामने खड़ा है, जिस कारणों से उन्हें भारतीय होने पर गर्व महसूस होता, उसके पीछे कितने महापुरुषों के अथक प्रयासों की अमिट छाप है |    
    ऐसे ही महापुरुषों में एक नाम है – पं. महामना मदन मोहन मालवीय | जिनके व्यक्तित्व पर प्रकाश डालते  हुए मुझे आज गौरव की अनुभूति हो रही | जिनके कर्मो की छाया तले आज हजारो विद्यार्थी स्वयं को शिक्षित होता पा रहे | ”पं. मदन मोहन मालवीय“ यह कोई व्यक्ति विशेष का नाम नही है, यह एक ऐसी शक्ति थी, जिसने मिट्टी के उपकरणों से फौलाद के हथियार डालने की क्षमता रखी | काल का चक्र किसी प्रश्रवन सील सरिता की भाति सदैव गतिमान रहता है | महापुरुष आते है और अपने कर्मो की अमिट छाप समय क वक्षस्थल पर अंकित कर जाते है, और यह विश्व उन्ही पदचिन्हों का अनुकरण करता हुआ शनै शनै प्रगति क मार्ग पर अग्रसर होता है | फिर भारतभूमि तो आदिकाल से ही रत्ना प्रस्वरी रही है | समय समय पर यहा न जाने कितने महापुरुषों ने अवतरित होकर न केवल भारत अपितु सम्पूर्ण विश्व को मानवता का पाठ पढाया | महान विभूतियों की महामाला की एक जगमगाती हुई मणि हमारे दास्ताँ के दिनों में भारतभूमि पर अवतरित हुई | हिन्दू समाज ने इसे “पंडित” कहकर पुकारा तो विश्व ने उसकी “महामना” कहकर वंदना की | दोस्तों, वह एक ऐसा स्वप्नदृष्टा था, जो अपने समय में 2500 वर्ष पुराने नालंदा विश्वविद्यालय का स्वप्न देखता था | वह एक स्वप्नदृष्टा था जिसने कभी स्वप्न में तक्षशिला विश्वविद्यालय को तो कभी विक्रमशिला के विश्व विद्यालय को देखता था | इस स्वप्न ने उसे प्रेरणा दी एक ऐसा स्वप्न पालने की, जिसने धीरे धीरे मूर्त रूप लेना शुरू किया | और फिर उस मूर्त में अपने अथक प्रयासों से उसने जान फूंक दी, और देखते ही देखते काशी में गंगा के तट पर खेतों के बीच से गेरुआ वस्त्र पहन कर वो कल्पना विशाल रूप धारण करने लगी | लोगो को प्रथम दृष्टि में इस बात पर विश्वास नही हुआ, परन्तु जब अपनी कड़वाई आंखे धुल कर लोगो ने उस स्वप्न की ओर देखा तो उन्हें लगा कि ये एक ऐसा स्वप्न था जो अब सच हो चुका है, यह एक ऐसा सच था जिसे अब झुटलाया नही जा सकता | ऐसा था सृजन हमारे “काशी हिन्दू विश्वविद्यालय” का | दोस्तों, ऐसे व्यक्ति के व्यक्तित्व पर प्रकाश डालते हुए कुछ पंक्तिया मुझे याद आ रही कि –

“मै न बोला किन्तु मेरी आत्मा बोली,
कल्पना की जीभ में भी धार होती है,
पाँव होते है विचारो के नही केवल,
स्वप्न के भी हाथ में तलवार होती है |”
    दोस्तों, बात करे यदि राजनैतिक जीवन की तो महज़ 25 वर्ष की आयु में कोलकाता में इंडियन नेशनल कांग्रेस के प्रथम अधिवेशन में उन्होंने अपना पहला भाषण दिया | और देखते ही देखते लगातार चार बार वो इंडियन नेशनल कांग्रेस के अध्यक्ष चुने गये | और इस तरह उन्होंने सकारात्मक दिशा दी सम्पूर्ण भारतीय राजनीति को | राजनीति के परिपेक्ष में एक वक्तव्य मुझे याद आता है , जब उनके एक मित्र ने बड़े ही सहज रूप से यह कह दिया था कि राजनीति में स्वयं का विकास और दूसरे का विनाश अभीस्ट है तो मालवीय जी ने बड़े ही प्रेम से यह उत्तर दिया कि घृणा है मुझे ऐसी राजनीति से जिसमे सभी के समान विकास का समान प्रावधान न हो | दोस्तों, यदि बात की जाए अधिवक्ता जीवन की तो वह ऐसा महान अधिवक्ता था जिसकी सत्य के प्रति लगन ने 150 देशभक्तों को जो चौरी-चौरा कांड में फसे थे, फांसी के तख्ते से वापस बुला लिया | अरे भाषा के लिए लड़ा तो देवनागरी लिपि को कानूनी काम काज की भाषा ही बनवा डाला | मालवीय जी को यह पता था कि अगर दुश्मन से लड़ना है तो उसकी नीतियों में निपुण होना आवश्यक है | इसीलिए अंग्रेजी हुकूमत का लगातार विरोध करते हुए भी उन्होंने कभी अंग्रेजी भाषा का विरोध नही किया | और 1909 में स्वयं “द लीडर” पत्रिका का संपादन किया |
    आज सम्पूर्ण विश्व ललायित होकर हमारी ओर देख रहा है, वह हमसे यह प्रश्न कर रहा है कि मालवीय के उस स्वप्निल भारत को हम कौन सी दिशा देते है और सम्पूर्ण विश्व यह पुकार लगा रहा है कि -
“ सुख की अति से संतृप्त देश यह देख रहे है, देखे पंडित का नया देश क्या करता है,
जीता है वह अपना अमोघ अमृत पीकर या नक़ल हमारी ही करके वह मरता है’
बस यही बिंदु, बस यही बिंदु जिस पर निर्भर है हार जीत, यह देश ध्वंसकारी युग का क्रेता होगा,
या फूंक मार अम्बर में कोई महामंत्र, विज्ञान में कलयुग का भारत नेता होगा || "
                                                    
                                                                 - सौम्या त्रिपाठी



Tuesday, 9 June 2015

उम्र नही उत्साह है जीवन का पैमाना


आज के आधुनिक युग में बहुत से ऐसे लोग है, जिन्होंने अपने कार्यो ने के साथ साथ कार्य करने की शक्ति घटती जाती है | परन्तु जिन लोगो के हौसले बुलंद होते है, कुछ कर गुजरने की चाह होती है, मन में अपार इच्छाशक्ति व संकल्पशक्ति होती है, ऐसे लोगो के सामने सारीसे उम्र को पीछे छोड़ दिया है | यह उक्ति सच ही है कि हमारे शरीर के कार्य करने की एक सीमा है | उम्र बढ़ बाधाए घुटने टेक देती है, ऐसे व्यक्तियों में आत्मशक्ति कूट कूट कर भरी होती है | वे अपने अन्दर की भावनाओ व इच्छाओ को कभी मरने नही देते | युवा किसी आयु अवस्था का नाम नही है |
    वो कहते है न, "मानव जब जोर लगाता है, पत्थर पानी बन जाता है |"
 जो व्यक्ति कार्य करने में सक्षम होता है , वह कभी स्वयं को लाचार महसूस नहीं करता | बहुत से लोग उम्र बढ़ने के साथ साथ सोचने लगते है की अब तोह हमारी उम्र हो गयी है | अब हमसे ये नही हो सकता | उनकी यही प्रक्रिया उन्हें निर्बल बना देती है | व्यक्ति जितना कार्य अपने शरीर से करता है, उससे कई गुना कार्य वह अपने मस्तिष्क से करता है | यदि मन की शक्तियां ही मरणशील हो जाए, तो फिर सब कुछ असंभव सा लगने लगता है |
   "कोई भी मनुष्य चाहे कितना भी बड़ा ज्ञानी हो या प्रशिक्षित हो, वह तब तक अज्ञानी रहता है जब तक उसे ज्ञान का अनुभव न हो"
   जिस प्रकार दूध से माखन निकालने के लिए बहुत मेहनत लगती है , ठीक उसी प्रकार अनुभव प्राप्त करने के लिए जिन्दगी के कई पड़ाव पार करने पड़ते है | परन्तु एक बार ये प्राप्त हो जाने के बाद अपने ये लोग अपने अनुभव से दूसरो की मदद भी करते है और अपने कार्यो की खुशबू से समाज को महकाते भी है |

   जीवन उमंग, उत्साह एवं उद्देश्य से ही परिभाषित होता है, उम्र से नहीं |                          


                                                                                                                          -संजिका कुमारी
   

Monday, 19 January 2015

आज का मानव और मानवता

विधाता की इस विशाल सृष्टि में मानव ही उसकी सर्वश्रेष्ठ कृति है, जिसे 'BEST CREATION OF THE GOD" के नाम से भी जाना जाता है | ऐसा क्यों कहा जाता है इसका आधार क्या है, जब हम इस बात का पता लगाने की कोशिश करते है, तो हम पाते है कि अपने स्वार्थों से ऊपर उठकर एक-दूसरे के लिए जीवन समर्पित कर देने का नाम ही मनुष्यता है |
               कविवर गुप्त जी के शब्दों में- "यही तो पशु प्रवृति है कि आप आप ही चरे, वही मनुष्य है कि जो मनुष्य के लिए मरे |" इस प्रकार आदि काल से ही विधाता द्वारा प्रदत इस अलौकिक ज्ञान के प्रकाश तले मानव ने अपना उत्कृष्ठ जीवन बिताना प्रारंभ किया, जिसे देख देवताओं को भी इर्ष्या हो उठी | वे भी इस देव दुर्लभ मानव शरीर को प्राप्त करने के लिए व्याकुल हो उठे |
             कविवर तुलसीदास जी के शब्दों में-
"बड़े भाग मानुस तन पावा,सुर दुर्लभ सब ग्रन्थ निगावा"
            परन्तु अब इसे मानव जाति का दुर्भाग्य कहा जाय या किसी देवता का अभिशाप कि आज अपनी अहमन्यता और स्वार्थपरता से विकारग्रस्त होता हुआ मानव पशुता के कगार पर खड़ा है | यह मानव किसी विशेष देश का नहीं है , अपितु यह मानव सम्पूर्ण विश्व का है, यहा चर्चा सम्पूर्ण विश्व के मानवों की हो रही, जो आज अपने उदर की भूख मिटाने के लिए भले ही अन्न का प्रयोग करते हो परन्तु अपनी मानसिक भूख मिटाने के लिए मानवता को खाते जा रहे है |
             आज अगर देश के कर्णधार नेता से लेकर सामान्य जनता तक उन बलिदानियों को गिने चुने शब्दों में श्रधांजलि अर्पित करने का नाटक करके ही अपने कर्तव्यों की इतिश्री मान ले तो इससे बड़ा दुर्भाग्य और क्या होगा |  दुर्भाग्य उस देश का जहाँ पश्चिमी सभ्यता के चूल्हे में अपनी मर्यादा का ईंधन जलाने वालों की कमी नहीं है, दुर्भाग्य उस देश का जहाँ मात्र धनवान बनने के लिए अपने राष्ट्र की अस्मिता को चौराहे पर खड़ा  करके बेचने वालों की कमी नही है | लंदन के चौक के घड़ियाल की आवाज़ तो हम अपने रेडियो पर सुन लेते है, परन्तु दर्द से कराहते अपने पड़ोसी की चीखे हमें सुनाई नही देती |
          और तो और अगर बात की जाए हमारे राजनेताओं की तो उन्होंने भी इस देश को भवर में डुबोने के उद्देश्य से पतवारे फेक दी है | अरे, "यदि भवर दिखाना ही ता माँ को, क्यों बापू बलिदान हुए,
                                        क्यों शहीद हुआ वो भगत सिंह, बिस्मिल सुखदेव के प्राण गए,
                                        क्यों चमकी झाँसी की रानी और प्राण ताजे इस माती में,
                                       होना था जब फिर नर सिंघार अपनी कश्मीर की घाटी में'
                                       क्यों घायल होता रहा हिमालय, क्यों भारत माता सहती रही,
                                       क्या देख स्वर्ग से माँ की दशा आज़ाद की छाती नहीं फटी"
        परन्तु भोगवाद में जीवन व्यतीत करने वाले इन् राजनेताओं को ऐसी भावनाओं से क्या लेना | दूसरी ओर हमारी भारतीय जनता तो दिन प्रतिदिन ऐसे मनुष्यों का गढ़ बनती जा रही है जो अपने कर्मक्षेत्र में ध्रतराष्ट्र बनकर जीने में ही स्वर्ग की प्राप्ति समझते है |
       आज का मानव पूरी तरह से कर्महीन बन चुका है | उसका जीवन यन्त्र की भांति सीमित हो चुका है | यन्त्र का भी कोई कार्य होता है | चलते- चलते गिर जाना ही उसकी इष्ट है | समझ में ही नही आता जीवन है क्या. क्या करने आये थे और क्या कर डाला, बस जब आँख खुली और समझने लायक हुए तो एक ही उद्देश्य सामने दिखा कि अपना स्वार्थ साधो और निकलते बनो यहा से | राष्ट्र हमे कुछ देने नही आ रहा, मिटने दो राष्ट्र को बस स्वयं को देखो | शायद इसी सांस्कृतिक विघटन की वजह से आज हमारा भारतवर्ष एक ऐसे कगार पर आकर खड़ा हो गया कि जहा से कोई भी शत्रु राष्ट्र बड़ी आसानी से इसे चोट पहुचा कर निकल जाता है, और हमारे राष्ट्र के नेतागढ़ सिद्धान्तों की माला हाथ में लिए अहिंसा वादी बन जाते है | चूकि शायद इसी अहिंसावाद की वजह से कही न कही उनके निजी स्वार्थों की भी पूर्ति होती है |
      आज के भारतवर्ष की एक छोटी सी तस्वीर तो मैंने आपके समक्ष प्रस्तुत कर दी, परन्तु कल का भारतवर्ष कैसा होगा ये आप पर ही निर्भर है | अब दो पंक्तियों के साथ मै अपने शब्दों को विराम देना चाहूंगी-
                                          "जीवन की माया छोड़ मूर्ख, जीवन पानी सा बहता है,
                                           लुट जाते सब झूठे वैभव, बस नाम धरा पर रहता है |"
                                                                                                   
                                                                                                                           - सौम्या त्रिपाठी

Sunday, 18 January 2015

माँ

कब्र की आगोश में जब थककर सो जाती है माँ, तब कही जाकर थोडा शुकून पाती है माँ
फ़िक्र में बच्चो की कुछ इस तरह घुल जाती है माँ, कि नौजवा होते हुए भी बूढी नजर आती है माँ
कहते है कि रिश्तों की गहराईयों को तो देखिए, चोट लगती है हमें और दर्द को उठाती है माँ
खुद रातों की नींद उड़ाकर, बच्चों को लोरी में डुबाकर सुलाती है माँ
घर से परदेश जाता है जब नुरे-नज़र, हाथ में कुरान लेकर दर पर आ जाती है माँ


जब भी घिरते है हम परेशानी में, आँसू पोछने खाबों में आ जाती है माँ
खुशियों में भले ही हम भूल जाये माँ को, गम में पर हमेशा याद आती है माँ
लौट कर जब हम आते है थक कर, प्यार भरे हाथों से सिर को सहलाती है माँ
शुक्रिया उसका अदा हो नही सकता, मरते मरते भी दुआ जीने की दे जाती है माँ
मरते दम तक जब बच्चा न आये परदेश से, पुतलिया दोनों अपनी चौखट पर छोड़ जाती है माँ
प्यार कहते है किसे और ममता क्या चीज़ है, ये तो उनसे पूछो जिनकी बचपन में ही मर जाती है माँ |
                                                                                 
                                                                              - मोना सिंह















Friday, 16 January 2015

किताबें : सच्ची मित्र ...

आपने अक्सर सुना होगा की पढाई एक तपस्या है, जिसने यह तपस्या पूरी कर ली, वह समझो सागर को पार कर गया | मेरे इस विषय अर्थात् किताबें सबसे अच्छी व सबसे सच्ची दोस्त का अभिप्राय क्या है ,चलिए इस तथ्य का पता लगाने की एक छोटी सी कोशिश साथ मिलकर करते है | किताबें, सच्ची मित्र किस प्रकार से है, इससे पहले हमें यह जानना है कि सच्चा मित्र आखिर कौन होता है, क्या है इस शब्द का अभिप्राय | बात यह है कि मित्रता मेरे व्यक्तिगत जीवन का एक अभिन्न व बहुमूल्य अंग है | ऐसा कब, कहाँ और कैसे हुआ अगर इसकी बात करेंगे तो एक नयी कहानी बन जाएगी तो अभी इस बात को छोड़कर इस तथ्य पर विचार करते है कि क्यों न दोस्ती की शुरुआत किताबो से ही की जाए | सच्चा दोस्त : एक एहसास जिसमे विश्वास होता है कि हम कितनी भी बड़ी मुसीबत में क्यों न हो ,वह हम पर विश्वास व् हमारी मदद जरूर करेगा, इसी प्रकार किताबो पर लिखा ज्ञान हमें हर पल हर मुसीबत से बाहर खींचता है | जितना आप अपने इस नए दोस्त के साथ समय बिताओगे उतनी ही दोस्ती गहरी और अटूट होती जाएगी | कभी कभी तो रात रात भर वार्तालाप चलती रहती है ,कहीं कहीं बहस भी शुरू हो जाती है, कभी कभी गीतों के साथ आप अपने इस नए दोस्त के संग किसी गहरे विषय में उलझे होगे | कई सवाल उठेंगे कई जवाब मिलेंगे | एक बार रात भर जाग कर तो देखो अपने इस नए दोस्त के साथ , सर्वमान्य तथ्य है कि ऐसी आनंद की प्राप्ति आपको जीवन में कभी न होगी | ऊंच –नीच, जात-पात से ऊपर उठकर होती है ये दोस्ती | जब कभी आप अपने इस नए मित्र को पर्याप्त समय नहीं दे पाओगे तो आपको स्वयं आभास होगा की आज कुछ छूट रहा है कुछ कमी सी है, जैसे जिन्दगी हथेली से छूट रही हो जैसे कोई ट्रेन छूट रही हो | बहुत सी नयी चीजे सीखने को मिलेगी आपको | आप असल में स्वयं को पहचान पाओगे, खुद से मिल पाओगे | जिस पल आपकी किताबो से सच्ची मित्रता हो गयी ,उस दिन से न ही पढाई बोझ लगेगी और न ही तपस्या | बस एक कर्तव्य का आभास होगा  आपको अपने इस नए दोस्त के प्रति | एक प्रेम एक लगाव की अनुभूति होगी और आपका यह नया दोस्त आपको उस ऊंचाई तक पहुंचा देगा, जहाँ सम्पूर्ण संसार आपके कदमो तले हो |


                                                                   - सौम्या त्रिपाठी

Friday, 19 September 2014

हिंदी पखवाडा -निबंध प्रतियोगिता

हिंदी दिवस के शुभ  अवसर पर, आईआईआईटीएम ग्वालियर के स्टाफ और छात्रों द्वारा , हिंदी पखवाड़े का आयोजन किया जाता है | पखवाड़े के अंतर्गत विभिन्न प्रतियोगिताओं का आयोजन किया जाता है | 17 सितंबर को निबंध लेखन प्रतियोगिता का आयोजन किया गया था | महाविद्यालय के सभी छात्रों ने प्रतियोगिता मे उत्साह दिखाया और इसे सफल बनाया | निबंध प्रतियोगिता का विषय " परिवर्तन आयेगा , हम लायेंगे " था | इस विषय पर छात्रों का उत्साह देखने योग्य था |

सभी छात्रों ने अपने कौशल का बेहतरीन प्रदर्शन किया | परिणाम जानने के लिये सभी छात्र प्रतीक्षारत हैं | पखवाड़े के आयोजन ने छात्रों की हिन्दी के विषय में रुचि जगाई है |

Tuesday, 15 April 2014

जुस्तुजू



अभी तो दिल में हल्की सी
खलिश महसूस होती है,
बहुत मुमकिन है कल इस का
मोहब्बत नाम हो जाये |

ख्यालो में ये कौन आया
सितारों की चमक लेकर ,
मेरे साहों पे बिखरे है ,
यह किस के ज़ुल्फ़ के साये,
बहुत मुमकिन है कल इस का
मोहब्बत नाम हो जाए |

यह कैसी बेखुदी है ,
दिल में कैसा खौफ छाया है ,
यह मेरी जगती आँखों मैं
कैसे ख्वाब लहराए ,
बहुत मुमकिन है कल इस का
मोहब्बत नाम हो जाए |

रुकी है जिंदगी एक
मुस्कराते मोड़ पे आ कर ,
कहीं ये मुस्कराहट
जिंदगी का ग़म न बन जाये ,
बहुत मुमकिन है कल इस का
मोहब्बत नाम बन जाए.....