Sunday, 14 August 2016

मुक्त भारत !!!

तुलसीदास ने  लिखा है-

"पराधीन सपनेहुँ सुख नाहीं ।"
पराधीन को स्वपन में भी सुख नही मिलता।

वैसे तो आजादी शब्द में सम्पूर्ण आकाश निहित है पर यदि  भारतवर्ष के सन्दर्भ में कहे तो 15 अगस्त 1947 आज़ादी  मिलने वाला वो दिन माना जाता है जिस दिन  भारतवर्ष ने ब्रिटिश शासन की गुलामी की जंजीरों से मुक्ति पायी थी ।

Long years ago we made a tryst with destiny, and now the time comes when we shall redeem our pledge, not wholly or in full measure, but very substantially. At the stroke of the midnight hour, when the world sleeps, India will awake to life and freedom.

15 अगस्त 1947 को आजादी की घोषणा के लिये बोले गये पंडित जवाहर लाल नेहरू के वो शब्द जिन्होने समस्त जन साधारण के अन्दर चेतना और उमंग की लहर का प्रसार किया ।

आजादी का वो स्वर्णिम दिवस जिसके स्वपन भर के लिए भारतीय युवकों, क्रान्तिकारियों, राजनेताओं ने अपने प्राणों की बाजी लगा दी। आज 15 अगस्त 2016 को हम भारतवासी अपनी स्वतंत्रता की 70वीं वर्षगाँठ मना रहें है।
यह कहना अतिश्योक्ति नही होगी की आज भारत की सारी उपलब्धियों, कीर्ति, वैश्विक विकास, सभी यदि सम्भव हो पाएँ है तो स्वाधीनता के कारण।

सदियों से भारत अंग्रेजों की दासता में था, उनके शोषण व  अत्य्चार से भरी नीतियों के कारण सम्पूर्ण देश की जनता त्रस्त थी। स्वाधीनता के स्वपन का पहला बिगुल बजा 1857 की क्रांति के साथ, वर्षों चले आन्दोलन में हमने वीरता के वो अनुभव देखे जो भारतीय इतिहास को हमेशा गौरवमयी बनाए रखेँगे। माखनलाल चतुर्वेदी ने अपनी रचना "पुष्प की अभिलाषा" में  कहा था..
"मुझे तोड़ लेना वनमाली, उस पथ पर देना तुम फेंक
मातृभूमि पर शीश चढाने, जिस पर जाए वीर अनेक।

क्रांतिकारियों के बलिदान का मूल्य आँकने का विचार लाना भी अनुचित होगा। एक ओर महात्मा गाँधी, पंडित नेहरू, सरदार वल्लभ भाई पटेल एवं अन्य नेताओ के अहैंसिक आंदोलन व दूसरी ओर भगत सिंह , आजाद के बलिदान से भड़की क्रांति के ज्वाला ने अंग्रेजों को भारत की स्वतंत्रता के प्रस्ताव पर विचार करने पर विवश कर दिया।

तत्कालीन गवर्नर लॉर्ड माउंटबेटेन ने भारतीय राजनीति के ऐतिहासिक निर्णय की औपचारिक घोषणा की, पर केवल यह आजादी नही थी, ब्रिटिश सरकार ने भारत नही अपितु 565 रियासतों को स्वतन्त्र घोषित करने का निर्णय किया था। पूरा देश यूँ तो एक डोर में बँधा माना जाता था परंतु स्वाधीनता की घोषणा के पूर्व ही हर रियासत एक स्वतन्त्र राष्ट्र बनने का स्वपन देखने लगी थी।

सरदार पटेल व मेनन जैसे कूटनीतिक राजनेताओं ने रियासतों को जोड़ने का काम पूर्ण किया। पर इसी घटनाक्रम में विभाजन का सामना भी करना पड़ा। धर्म के नाम पर दो विभाजित हिस्सों में दो नए राष्ट्रों को आजादी मिली - भारत व पकिस्तान। भारत के कवियों ने अपनी कलम को क्रांति की तलवारों के समकक्ष चलाया था, महाकवि दिनकर, जय शंकर प्रसाद ने उस दौर में ऐसा लिखा था जिसे आज भी पढ़कर देशभक्ति उभर उभर आती है।


हिमाद्रि तुंग श्रृंग से प्रबुद्ध शुद्ध भारती
स्वयंप्रभा समुज्जवला स्वतंत्रता पुकारती
अमर्त्य वीर पुत्र हो, दृढ़-प्रतिज्ञ सोच लो
प्रशस्त पुण्य पंथ हैं – बढ़े चलो बढ़े चलो
असंख्य कीर्ति-रश्मियाँ विकीर्ण दिव्य दाह-सी
सपूत मातृभूमि के रुको न शूर साहसी
अराति सैन्य सिंधु में, सुबाड़वाग्नि से जलो
प्रवीर हो जयी बनो – बढ़े चलो बढ़े चलो
– जयशंकर प्रसाद
आज स्वाधीनता दिवस के अवसर पर हर भारतीय नागरिक का कर्तव्य बनता है की उन शहीदों को नमन अर्पित करें जिनके बलिदानों के कारण आज खुली हवा में हम साँस ले पा रहें है, अपने देश के निर्णयों में भागीदारी निभा पा रहें हैं।

पर एक ओर प्रश्न यह उठता है कि क्या समय के साथ हम स्वराज की परिभाषा को अपने अनुसार बदल रहें हैं ? क्या  हमारे स्वतंत्रता सेनानियों ने स्वराज के स्वपन में भ्रष्ट्राचार ओर भेदभाव की कल्पना भी की थी ? क्या भारत का वही  प्रारूप आज हमारे सामने है जिसके लिये युवाओं ने फँसी के फंदे को गले लगा लिया था? ये प्रश्न शायद कुछ साहित्यिक लगे पर इनका उत्तर शायद आने वाली पीढियों के भविष्य नींव बने...

"पूज रहा है जहाँ चकित हो जन-जन देख अकाज,
सात वर्ष हो गए राह में अटका कहाँ स्वराज?"
- दिनकर 

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